फ़ाइल 023 · क़ानूनी पहलू
किसी से क्रिप्टो ट्रेड करवाया और घाटा हुआ — भारत में कौन-सी रक़म वापस माँगी जा सकती है?
भारत में «मेरी तरफ़ से ट्रेड कर दो» वाला इंतज़ाम अपने-आप शून्य नहीं होता। झगड़ा तीन बातों पर टिकता है: उसके पास अब भी कितना पड़ा है, उसने आपकी हिदायत मानी या नहीं, और यह सब आप काग़ज़ पर दिखा पाते हैं या नहीं।
मान लीजिए आपने किसी जान-पहचान वाले को ₹50,000 भेजे, क्योंकि वह «रोज़ का दो-तीन परसेंट निकाल लेता है»। उसने अपने एक्सचेंज खाते से ट्रेड किया, शुरू के दो हफ़्ते स्क्रीनशॉट आते रहे, फिर एक दिन जवाब आया — «मार्केट गिर गया, सब चला गया»। क्या आप उस पर केस कर सकते हैं? हाँ, कर सकते हैं। पर उससे पहले यह जान लेना ज़्यादा काम का है कि केस जीतने पर हाथ में आता क्या है।
भारत में यह सवाल किसी ख़ास क्रिप्टो क़ानून से नहीं, डेढ़ सौ साल पुराने भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (Indian Contract Act) से सुलझता है। आप «मालिक» (principal) हैं, वह «एजेंट» है, और एजेंट की ज़िम्मेदारियाँ अधिनियम में साफ़ लिखी हैं। नीचे हर बात उन्हीं धाराओं के सहारे खोली गई है।
भारत में ऐसा क़रार अपने-आप शून्य क्यों नहीं होता
पहला डर अक्सर यही होता है: «क्रिप्टो तो ग़ैरक़ानूनी है, अदालत सुनेगी ही नहीं।» यह बात भारत पर लागू नहीं होती। 4 मार्च 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने Internet and Mobile Association of India बनाम RBI मामले में RBI का 6 अप्रैल 2018 वाला सर्कुलर रद्द कर दिया था — वही सर्कुलर जिसने बैंकों को क्रिप्टो से जुड़े लेन-देन में सेवा देने से रोका था। फ़ैसले के तर्कों में एक बात यह भी थी कि वर्चुअल करेंसी का कारोबार किसी क़ानून में प्रतिबंधित नहीं है। उसके बाद से सरकार क्रिप्टो की कमाई पर 30% टैक्स और बिक्री पर 1% TDS वसूल रही है — यानी यह लेन-देन क़ानून की नज़र में मौजूद है, उस पर टैक्स भी लगता है।
एक और कड़ी 25 अक्टूबर 2025 को जुड़ी। मद्रास हाई कोर्ट ने Rhutikumari बनाम Zanmai Labs में कहा कि क्रिप्टो न मूर्त संपत्ति है, न मुद्रा, लेकिन संपत्ति है — जिसे रखा और भोगा जा सकता है, और जो ट्रस्ट में रखी जा सकती है। यह एक जज की बेंच का फ़ैसला है, आर्बिट्रेशन से जुड़ी अंतरिम राहत के मामले में आया, इसलिए इसे पूरे देश का आख़िरी शब्द मत समझिए। पर जिसने आपके लिए कॉइन ख़रीदकर अपने पास रखे हैं, उससे वे कॉइन माँगने का तर्क इससे मज़बूत होता है।
तो क़रार कब शून्य (void) होगा? संविदा अधिनियम की धारा 23 के मुताबिक़ जब उसका उद्देश्य या प्रतिफल ग़ैरक़ानूनी हो — क़ानून से मना हो, किसी क़ानून को नाकाम करता हो, धोखाधड़ी वाला हो, किसी के व्यक्ति या संपत्ति को नुक़सान पहुँचाता हो, या अदालत उसे अनैतिक या लोकनीति के ख़िलाफ़ माने। दोस्त के कहने पर उसके खाते से बिटकॉइन ख़रीदना-बेचना इनमें से किसी खाने में अपने-आप नहीं आता। हाँ, अगर «ट्रेडिंग» असल में किसी का काला पैसा घुमाने या टैक्स छिपाने का पर्दा थी, तो तस्वीर बदल जाती है।
और अगर किसी मामले में अदालत क़रार को शून्य मान भी ले, तब भी पैसा हवा नहीं होता। धारा 65 कहती है कि शून्य क़रार के तहत जिसने भी कोई फ़ायदा पाया है, उसे वह लौटाना होगा या उसकी भरपाई करनी होगी — जिससे पाया, उसी को।
झगड़े की रक़म को तीन हिस्सों में बाँटिए
«मेरे ₹50,000 वापस करो» — यह एक माँग लगती है, पर अदालत में यह तीन अलग रक़में हैं, और हर एक का रास्ता अलग है।
1. जो अब भी उसके पास पड़ा है
आपके भेजे पैसे का जो हिस्सा कभी ट्रेड में लगा ही नहीं, खाते में बचा बैलेंस, बचे हुए कॉइन, और उसने जो «फ़ीस» या «हिस्सा» काट लिया — यह सबसे मज़बूत दावा है। धारा 218 एजेंट को बाँधती है कि आपकी तरफ़ से जो भी रक़म उसे मिली, वह (अपने जायज़ ख़र्च काटकर) आपको दे। धारा 213 कहती है कि माँगने पर उसे सही हिसाब देना होगा। यानी पहला क़दम ग़ुस्से वाला मैसेज नहीं, लिखित में पूरा हिसाब माँगना है: कब कितना आया, कौन-से ऑर्डर लगे, अभी खाते में क्या है, बीच में कितना निकाला गया।
2. जो बाज़ार में सच में डूब गया
यहाँ फ़ैसला एक सवाल पर टिकता है: आपने क्या कहा था, और उसने क्या किया? धारा 211 के मुताबिक़ एजेंट को मालिक की हिदायत के हिसाब से काम करना होता है; उससे हटकर काम किया और घाटा हुआ, तो भरपाई उसे करनी है — और मुनाफ़ा हुआ, तो उसका हिसाब भी आपको देना है।
अगर आपने लिखा था «सिर्फ़ बिटकॉइन, कोई लीवरेज नहीं», और उसने 20x के फ़्यूचर्स में पैसा लगा दिया, तो डूबी रक़म उसकी ज़िम्मेदारी बन सकती है। अगर आपने कहा था «जैसा ठीक लगे, करो», तो बाज़ार का घाटा आम तौर पर आपका ही है — एजेंट बाज़ार के गिरने का बीमा नहीं होता। बीच का हिस्सा, यानी मौखिक बातें, इस पर टिकेगा कि चैट में क्या बचा है।
3. जो मुनाफ़ा या «गारंटी» वादे में थी
भारत में «घाटा हुआ तो मैं भरूँगा» या «हर महीने 10% पक्का» जैसा वादा सिर्फ़ इसलिए बेकार नहीं हो जाता कि वह क्रिप्टो से जुड़ा है। मुश्किल दो दूसरी जगह है। एक, वादा ज़्यादातर फ़ोन पर या वॉयस नोट में होता है, और उसे साबित करना पड़ता है। दो, जो आदमी यही वादा दस-बीस लोगों से कर रहा है, वह दोस्त का एहसान नहीं, पैसा जमा करने की योजना चला रहा है — तब मामला अनियमित जमा योजनाओं पर रोक वाले क़ानून (Banning of Unregulated Deposit Schemes Act, 2019) और ठगी की धाराओं की तरफ़ मुड़ सकता है, और आपका दावा कई और लोगों के दावों के साथ क़तार में लग सकता है।
चार आम इंतज़ाम, और हर एक में बात कहाँ अटकती है
«पैसा मुझे भेजो, मैं अपने खाते से ट्रेड करूँगा»
सबसे आम शक्ल, और सबूत के मामले में सबसे कमज़ोर। एक्सचेंज खाता उसके नाम और उसके KYC पर है; बिक्री पर कटने वाला TDS उसके PAN पर दर्ज होता है और उसके टैक्स रिकॉर्ड (फ़ॉर्म 26AS / AIS) में दिखता है, आपके नहीं। प्लेटफ़ॉर्म के काग़ज़ों में आपका नाम कहीं नहीं है। आपके हाथ में बस दो चीज़ें हैं: बैंक या UPI ट्रांसफ़र का रिकॉर्ड, और वह चैट जिसमें लिखा है कि पैसा किस काम के लिए गया। इसीलिए ट्रांसफ़र के रिमार्क में दो शब्द — «crypto trading ke liye» — बाद में किसी लंबे वादे से ज़्यादा वज़न रखते हैं। उसके नाम पर हुई कमाई का टैक्स किसके हिस्से आएगा, यह एक अलग उलझन है; बड़ी रक़म हो तो किसी CA से पूछ लीजिए।
«उधार दे दो, मैं ट्रेड करके लौटा दूँगा»
यहाँ दो रिश्ते हैं। उधार देना एक रिश्ता है; उधार का पैसा उसने कहाँ लगाया, यह दूसरा। अगर बात सच में उधार की थी — तय रक़म, तय तारीख़ पर वापसी — तो उसका ट्रेड में हारना आपकी वसूली को ख़त्म नहीं करता। लिखा हुआ प्रॉमिसरी नोट या लिखित क़रार हो, तो सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 37 वाले संक्षिप्त मुक़दमे (summary suit) का रास्ता भी खुल सकता है, जो आम मुक़दमे से तेज़ चलता है।
पर अगर चैट में लिखा है «मुनाफ़े में आधा-आधा», तो वह उधार से ज़्यादा साझा निवेश जैसा पढ़ा जाएगा। अदालत काग़ज़ पर लिखे शब्द «लोन» से ज़्यादा पूरे रिकॉर्ड को देखती है।
«घाटा हुआ तो मेरी ज़िम्मेदारी»
ऊपर तीसरे हिस्से वाली बात यहाँ सबसे ज़्यादा चुभती है। जो «सर» Telegram या WhatsApp ग्रुप में घाटे की गारंटी दे रहा है, वह शायद ही अपने नाम से लिखकर देता है। और बाज़ार में ऐसी गारंटी देना अपने-आप में चेतावनी है — बाज़ार का घाटा कोई अपने सिर तभी लेता है जब उसकी कमाई कहीं और से आ रही हो। ऐसे प्लेटफ़ॉर्म और लोगों को परखने के सवाल ऊँचे रिटर्न वाले प्लेटफ़ॉर्म कैसे परखें में रखे हैं।
«रुपये नहीं, इतने कॉइन लौटाऊँगा»
कुछ लोग रक़म नहीं, कॉइन तय करते हैं: «0.01 BTC दिया है, 0.01 BTC ही लौटेगा।» मद्रास हाई कोर्ट वाले नज़रिए से कॉइन संपत्ति हैं, और उन्हें वापस माँगा जा सकता है। उलझन तब आती है जब उसके पास कॉइन बचे ही नहीं और भरपाई रुपये में तय करनी है — किस दिन के भाव से? क़रार टूटने वाले दिन के, केस दायर करने वाले दिन के, या फ़ैसले वाले दिन के? संविदा अधिनियम इसका जवाब किसी एक तय तारीख़ के रूप में नहीं देता; यह मामले के तथ्यों और क़रार की भाषा पर टिकता है। अगर कॉइन का भाव बीच में बहुत ऊपर-नीचे हुआ है, तो यह सवाल वकील से सबसे पहले पूछिए, क्योंकि रक़म का बड़ा हिस्सा इसी पर टिक सकता है।
पैसा देने से पहले — या आज ही, अगर दे चुके हैं
सबसे कम झगड़े वाला इंतज़ाम वह है जिसमें आपका पैसा किसी और के खाते में जाता ही नहीं; सलाह लेनी है तो लीजिए, ऑर्डर अपने खाते से ख़ुद लगाइए। फिर भी अगर पैसा जा चुका है, तो ये चीज़ें तय करेंगी कि बाद में आप कितना साबित कर पाते हैं:
- ट्रांसफ़र बैंक या UPI से, रिमार्क के साथ। नक़द दिया हुआ पैसा अदालत में सबसे मुश्किल से साबित होता है।
- शर्तें एक मैसेज में लिखवाइए। पैसा किसका है, कौन-से कॉइन, लीवरेज हाँ या ना, माँगने पर कितने दिन में वापसी, उसकी फ़ीस कितनी। उसका «ठीक है» वाला जवाब भी उसी चैट में रहने दीजिए।
- हर महीने हिसाब, ऑर्डर आईडी के साथ। सिर्फ़ «प्रॉफ़िट ₹4,200» वाला स्क्रीनशॉट नहीं — ट्रेड हिस्ट्री का वह पन्ना जिसमें तारीख़, जोड़ी और ऑर्डर नंबर दिखें।
- झगड़ा शुरू हो, तो पहले लिखित माँग। धारा 213 के तहत पूरा हिसाब माँगिए, धारा 218 के तहत बची रक़म। चैट में, ईमेल में, या वकील के नोटिस से — पर लिखित में।
चैट डिलीट मत कीजिए, चाहे बातचीत कितनी भी कड़वी हो गई हो। ग़ुस्से में भेजा गया उसका «हाँ तेरे पैसे मेरे पास हैं, बाद में दूँगा» आपके केस का सबसे क़ीमती वाक्य बन सकता है।
अगर ट्रेड कभी हुआ ही नहीं था
ऊपर की सारी बातें एक दीवानी झगड़े की हैं: दोनों को पता था कि पैसा ट्रेड में जा रहा है, बस घाटे पर अनबन हो गई। एक दूसरी शक्ल ऊपर से बिल्कुल ऐसी ही दिखती है — «सर» के डैशबोर्ड पर आँकड़े बढ़ते रहते हैं, पर कोई ऑर्डर कभी लगा ही नहीं; या आपसे एक ऐसे «प्लेटफ़ॉर्म» पर पैसा डलवाया गया जहाँ से निकासी हमेशा «टैक्स भरिए» या «वेरिफ़िकेशन फ़ीस» पर अटक जाती है। तब यह अनुबंध का मामला नहीं रहता। यह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318 (छल) और धारा 316 (आपराधिक न्यास-भंग) वाली ज़मीन है, और पहला क़दम मुक़दमे की अर्ज़ी नहीं, cybercrime.gov.in पर या 1930 पर शिकायत है — जितनी जल्दी, उतना बेहतर। सबूत किस क्रम में सँभालें, यह ठगी के बाद वाली सूची में है; ग्रुप वाले «सर» का पूरा ढाँचा ट्रेडिंग ग्रुप वाली फ़ाइल में खोला गया है।
एक लकीर उलटी तरफ़ भी है। अगर आप ही बहुत-से लोगों का पैसा लेकर उनके लिए ट्रेड कर रहे हैं और कट ले रहे हैं, तो आप «दोस्त की मदद» से निकलकर कारोबार वाली तरफ़ खड़े हैं — और जोखिम सिर्फ़ घाटे का नहीं रहता। इसके कुछ पहलू दूसरों के लिए USDT लेने वाली फ़ाइल में हैं।
यह फ़ाइल कहाँ तक साथ दे सकती है
यहाँ लिखी हर बात भारत के क़ानून पर है। चीन जैसी जगहों पर ऐसे क़रार को लेकर अदालतें बिल्कुल अलग दिशा में गई हैं, इसलिए किसी दूसरे देश के बारे में लिखी चीज़ यहाँ मत जोड़िए। भारत में भी, ऊपर की बातें संविदा अधिनियम के आम नियम हैं, जो हर एजेंट पर लागू होते हैं — क्रिप्टो वाला कोई अलग नियम नहीं। किसी एक मामले में अदालत क्या मानेगी, यह उसके सबूतों पर टिकेगा।
दो बातें इंतज़ार नहीं करतीं। एक, परिसीमा अधिनियम (Limitation Act, 1963) हर दावे के लिए समय-सीमा तय करता है, और तारीख़ निकल जाने के बाद मज़बूत दावा भी अटक जाता है। दो, जितना वक़्त बीतता है, उसके खाते में बचा बैलेंस उतना ही कम होता जा सकता है। रक़म छोटी नहीं है, तो ट्रांसफ़र के रिकॉर्ड और पूरी चैट लेकर किसी वकील के पास जाइए — इसी हफ़्ते।
इसके बाद अक्सर पूछे जाने वाले दो सवाल
उसने काग़ज़ पर «उधार» लिखकर दिया था, अब कहता है पैसा मेरे कहने पर ट्रेड में डूबा — क्या वह काग़ज़ बेकार हो गया?
नहीं। लिखा हुआ काग़ज़ आपकी तरफ़ से सबसे मज़बूत शुरुआती सबूत है, और उससे उलटी कहानी साबित करने का बोझ उस पर आता है। अदालत पूरा रिकॉर्ड देखेगी: अगर चैट से साफ़ हो कि पैसा आपकी हिदायत पर ट्रेड के लिए दिया गया था, तो मामला एजेंसी के नियमों पर चला जाएगा। तब भी उसके पास बची रक़म (धारा 218) और हिदायत तोड़कर डुबाई गई रक़म (धारा 211) पर आपका दावा बना रहता है।
उसने मेरे पैसे से मुनाफ़ा कमाया, पर अब हिस्सा देने से मुकर रहा है — क्या माँग सकता हूँ?
एजेंट के तौर पर उसे मुनाफ़े का भी हिसाब देना होता है — धारा 211 का आख़िरी हिस्सा और धारा 218 यही कहते हैं। पहले लिखित में पूरा हिसाब माँगिए (धारा 213)। वह मना करे, तो हिसाब दिलवाने (rendition of accounts) का दीवानी मुक़दमा एक रास्ता है। मुनाफ़े का बँटवारा किस अनुपात में होगा, यह इस पर टिकेगा कि आपकी शर्तें कहाँ और किस रूप में लिखी हैं।